
| دعيني أقاوم شوقي إليك |
| وأهرب منك ولو في الخيال |
| لأني أحبك وهما طويلا |
| وحلم بعيني بعيد المنال |
| دعيني أراك هداية عمري |
| وإن كنت في العمر بعض الضلال |
| دعيني أقاوم شوقي إليك |
| فإني كرهت أصول الرمال |
| نحب كثيرا ونبني قصورا |
| وتغدو مع البعد بعض الظلال |
| دعيني أراك كما شئت يوما |
| وإن كنت طيفا سريع الزوال |
| فما زلت كالحلم يبدو قريبا |
| وتطويه منا دروب المحال |
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